कहीं दिमाग नहीं तो कहीं दिल नहीं
जिधर देखो,
उधर एक नया नजारा है।
हर कोई चाहता जिसे
उसे बनाता अपना सितारा है।
मेरी नजर भी धरती की तरह,
गोल-गोल घूम रही है।
वो क्या चीज है,
जो चाँद न सही
मगर उसी के आगे-पीछे डोल रही है।
मँडरा रहा है, क्यों कोई भँवरा कलियों में?
हार मान कर बिखर रहे हो क्यों भँवर में?
हर किसी का अपना एक आसमाँ है जब
तो चाँद कमबख्त एक है क्यों?
वो भी अलग-अलग दो।
हर चीज का बँटवारा कर दो।
ये हमारा और वो तुम्हारा हक है।
सबका हिस्सा, अपना-अपना सच है।
पर क्या बाँटें से बँटा है प्यार,
सम्मान, ईर्ष्या, दुख-दर्द?
पता नहीं जिन्होंने बनाया
कोई उन्हीं से पूछे!
गलत है क्या और क्या सही
नियम तो साझे पर कर्तव्य हैं दूजे।
हर पल बनते-बिगड़ते,
नूतन-पुरातन अनुभवों का क्या?
कितने सारे क्षोभ, कितनी सारी व्यथा
कितना सारा प्रेम, कितनी सारी कथा
कौन बाँचेगा इनको?
कैसे फुर्सत दें हम उनको????
हर उजियारे और अँधियारे
गलियारों के बीच
कितनी सीढ़ियाँ चढ़ेंगे हम?
कितनी सीढ़ियों से गिरेंगे हम?
है कितने अजगर और कितने खरगोश?
कौन है मासूम और कौन है खामोश?





