Fish

Loading...

Tuesday, May 15, 2012

सब-कुछ उलट-पुलट


कहीं दिमाग नहीं तो कहीं दिल नहीं
किस्मत से हर किसी के पास
सब-कुछ नहीं।
जिधर देखो,
उधर एक नया नजारा है।
हर कोई चाहता जिसे
उसे बनाता अपना सितारा है।
मेरी नजर भी धरती की तरह,
गोल-गोल घूम रही है।
वो क्या चीज है,
जो चाँद न सही
मगर उसी के आगे-पीछे डोल रही है।
मँडरा रहा है, क्यों कोई भँवरा कलियों में?
हार मान कर बिखर रहे हो क्यों भँवर में?
हर किसी का अपना एक आसमाँ है जब
तो चाँद कमबख्त एक है क्यों?
वो भी अलग-अलग दो।
हर चीज का बँटवारा कर दो।
ये हमारा और वो तुम्हारा हक है।
सबका हिस्सा, अपना-अपना सच है।
पर क्या बाँटें से बँटा है प्यार,
सम्मान, ईर्ष्या, दुख-दर्द?
पता नहीं जिन्होंने बनाया
कोई उन्हीं से पूछे!
गलत है क्या और क्या सही
नियम तो साझे पर कर्तव्य हैं दूजे।
हर पल बनते-बिगड़ते,
नूतन-पुरातन अनुभवों का क्या?
कितने सारे क्षोभ, कितनी सारी व्यथा
कितना सारा प्रेम, कितनी सारी कथा
कौन बाँचेगा इनको?
कैसे फुर्सत दें हम उनको????
हर उजियारे और अँधियारे
गलियारों के बीच
कितनी सीढ़ियाँ चढ़ेंगे हम?
कितनी सीढ़ियों से गिरेंगे हम?
है कितने अजगर और कितने खरगोश?
कौन है मासूम और कौन है खामोश?                                       









Tuesday, May 8, 2012

एक गैर जरूरी बात...



न जाने क्या कुछ कहता रहता है
ये आईना चुप क्यों नहीं रहता है???

क्या मैं ही एक हूँ,
यहाँ सुनने वाली?

क्या मैं ही एक हूँ,
अपने अकेलेपन पर सिसकने वाली?

माना कि हर किसी के पास गम है,
पर क्या अपना गम भी कोई कम है?

इन सवालों के बीच घिरा दिल,
जिसमें तू है मौजूद
और मेरे आज पर भारी तेरा वजूद।

Wednesday, April 25, 2012

दिवास्वप्न


इस दफा तेरी खबर ही नहीं,

तू भी मिलता तो अच्छा था।

घर-द्वार तेरे आने से खिलता,
मन-उपवन तेरे आने से महकता,
तो ये अच्छा था।   

हम पुकारते और तुम इंकार 
करते,

पर फिर चोरी-चोरी आते।

फिर हम मनाते और तुम रुक जाते,

तो ये वादा पूरा करना भी अच्छा था।

कितना अच्छा था,  

कितना यकीन था,

इस दिवास्वप्न पर

अच्छा था,

जैसे सच्चा था 

पर ये सपना कच्चा था।

Wednesday, March 28, 2012

किसी बात की तरह

किसी सूनी राह की तरह
आज फिर सबके बीच
मैंने खुद को तन्हा पाया।
इस उन्मुक्त आकाश के तले,
मैंने खुद को बँधा पाया।
तुम्हीं बताओ कि क्या
अँधेरे में कहीं उगता है सूरज?
क्या चाँद की रोशनी सबको मिली,
एक बराबर?
क्या मैंने देखा जब फूलों को
तो तुम्हें याद आई मेरी?
क्या गूँजी खनक, उस पायल की
जो शहनाई बनेगी, जीवन की?
क्या संगीत सुनाई दिया,
उन अश्रुओं का, जो बहाए मैंने उनींदे होकर?
क्या पता चली, वह वेदना
जो मिली मुझे
तुमसे विलग होकर?
क्या महसूस हुए,
वे सारे भाव, जो हैं
दुख के, सुख के,
प्रेम के, विरह के,
संयोग के, वियोग के?
क्या जीवन के अलंकार, रस और छंद
तुम्हें गुनने को कहीं मिले?
क्या तुम खोज सके,
उन क्षणों में मुझे
जब मैं रही तुम्हारे आलिंगन में?
इतने सारे शब्दों और भावों के बीच,
क्या याद आई मैं तुम्हें?
या सिर्फ जिक्र हुआ,
मेरा
किसी बात की तरह।   

Monday, March 5, 2012

खतरा : सेफ प्ले

मुश्किल से नहीं सुलझती मुश्किल,
मुश्किल होती नहीं आसान क्यूं ?
उलझनों के बीच में,
छुपी है कोई दास्तान क्यूं?

बार-बार एक ही गलती,
मैं कैसे दोहरा सकती हूं।
गड़बड़ी भरा खेल है ये,
कैसे चकरा जाती हूं।

प्लीज नो मोर ट्रबल,
नो मोर ट्रबल,
दैट इज माई टैग लाइन।
लव माइसेल्फ एलॉट,
ओनली नीड टू फॉरगोट।

कैसे मैं ये सारी बातें
समझाऊं?
मुश्किल हो चुका है सब
तमाशा न बन जाऊं।।

Tuesday, February 21, 2012

बूंद बूंद मैं हूं तरसा. . .




बूंद बूंद रंग बरसा
लाल पीला हरा नीला
प्यार तेरा सजीला
बूंद बूंद रंग बरसा

तेरा मेरा
मेरा तेरा
सारा प्यार
बार बार
हर बार
छलका
प्यार छलका
बूंद बूंद रंग बरसा

तेरे संग सुनहरी भोर
तेरे संग सुनहरी धूप
तेरे संग सुनहरा सूरज
तेरा प्यार मैं सुनैहला
बूंद बूंद रंग बरसा

तेरे संग धरती धानी
तेरे संग मेरी कहानी
तेरे संग मैं हूं दीवानी
तेरे ही लिए तेरी दीवानी
बूंद बूंद रंग बरसा

नीला अंबर
नीला समंदर
नीली तेरी जुदाई
मुश्किल हो गई है मुझ पर
संभालनी मेरी तन्हाई
बूंद बूंद रंग बरसा

रंग बरसा
प्यार बरसा
बार बार
मैं हूं तरसा
बूंद बूंद रंग बरसा

Sunday, January 29, 2012

सिसकती रूह

सूनी, अंधेरी, सर्द रातों में,

कौन सिसकता है??
कौन है जो  मेरे दिल में 


बार-बार हूकता है??
जो अपने दर्द से 
 धीरे-धीरे 


पत्थर बने इस दिल को भी,
पिघलाने लगता है।
तब आंखों से नमकीन, खारे पानी जैसा 
कुछ बहने लगता है।
पर हर बार की तरह 


गीली और नम आंखें लिए
हम चुप हो जाते हैं
और मन किसी बेखौफ परिंदे

की तरह 
कहीं गुम हो जाता हैं।

बस पीछे रह जाती है
मेरी सिसकती रूह।।